शनिवार, 27 जुलाई 2019

नवांकुर

जो शिला को भेदे बो अंकुर हो मैं.
अभी तो नवांकुर हो मैं.
नरम मुलायम मिट्टी की मुछे आस नही.
ये सुविधा सब के भाग्य मैं नहीं.
सह ली मैंने कड़कड़ाती बिजलियां.
देखे हैं मैंने काले तूफानी बादल.
इनका मुझको भय नहीं.
अमावस के अंधेरे से भी मुझे मतलब नहीं.
और पूर्णिमा के चाँद से मेरा कोई  नाता नहीं.
पछुआ के तुफानो मे भी मैं खड़ा रहा.
न गिरने की जिद पर अड़ा रहा.
कठोरता मुझपे हाबी नहीं.
और स्नेह की मुझे कोइ आस नहीं.
अभी तो नवांकुर हों मैं.
धूप मैं छाव मैं खड़ा मैं.
हर घाव मैं.
क्यों कि शीतलता मेरे स्भाव मे.
अपने को, पराये को सब को.
सभी को दूंगा मैं छाव.
मुझमे नहीं कोई दुर्भाव.
लेकिन इस छाव के.
बदले मिले मुझे.
हृदय पर पीड़ा के ढेरो घाव.
देख के तुम मेरी भलमनसयत.
धैर्य कि मेरे परिझा तुम लेना नहीं.
        वक्त के फेर ने बांधा है मुझे.
         बुरे समय मैं मैंने खुद को है साधा.
         नवीन सृजन का अंकुर हूं.
         अभी तो नवांकुर हूं मैं.





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