मंगलवार, 21 जुलाई 2020

हरिवंश राय बच्चन


               हरीवंश राय बच्चन
बच्चन जी हिंदी के ऐसे कवि हैं जिन्होंने खुद कविता नहीं लिखी है बल्कि कविता ने ही स्वयं जिन्हे लिखा है. वह ज्ञान के बल पर किताबें पढ़ कर या काव्य सिद्धांत सीखकर नहीं लिखी गईं है, वह उनके जीवन से फुटकर आई है. ये शब्द है कवि गोपाल दास नीरज के हरिवंश राय बच्चन जी के काव्य के बारे में.
हिंदी साहित्य के आकाश में अर्धशती से अधिक समय तक देदीप्यमान नझत्र की भांति चमकने वाले कवि हरीवंश राय बच्चन का जन्म 27 नवंबर, 1907 को उत्तरप्रदेश के प्रागराज (इलाहबाद ) के एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था.इनका नाम हरिवंश राय था पर माँ दुलार से इन्हे बच्चन कहती थी, इनके पिता का नाम बाबू प्रतापनारायण था. इनकी प्राम्भिक शिझा एक स्थानीय पाठशाला में हुईं थी.
1938 में इन्होने इलाहबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम ए  उत्तीर्ण किया . असहयोग आंदोलन के दिनों में आपने अध्ययन स्थगित कर दिया. इसके बाद एक एक करके बच्चन जी, 'चाँद', 'भविष्य', 'अभ्युदय ', प्रयाग महिला विधापीठ '
पायनियर प्रेस, इलाहबाद मिडिल स्कूल आदि में काम किया.
पत्नी के देहावसान पर उनका ह्रदय शौक मग्न हों उठा. कवि नैराश्य के सागर में डूबा और 'मधुकलश 'का प्रणयन कर बच्चन जी ने उन्हें समर्पित किया.
इसके उपरांत बच्चन जी प्रयाग विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के अध्यापक रहे. लंदन से पी. एच. डी. की उपाधि प्राप्त की इसके बाद बच्चन जी ने विदेश मंत्रालय में प्रतिष्ठित रहकर हिंदी की गौरव वृद्धि में योगदान दिया.
1966 में हरिवंशराय बच्चन का भारतीय राज्य सभा के लिए नामनिर्देशित हुआ और इसके तीन साल बाद ही सरकार ने उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया। 1976 में, उनके हिंदी भाषा के विकास में अभूतपूर्व योगदान के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया गया.और उनके सफल जीवनकथा, क्या भूलू क्या याद रखु, नीदा का निर्मन फिर, बसेरे से दूर और दशद्वार से सोपान तक के लिए सरस्वती सम्मान दिया गया। इसी के साथ उन्हें नेहरू पुरस्कार लोटस पुरस्कार भी मिले है। अगर हम उन के बारे में प्रस्तावना जान्ने की कोशिश करे तो वन उन्होंने बहोत आसान बताई है। मिटटी का तन, मस्ती का मन, क्षण भर जीवन- यही उनका परिचय है।
रचनाएँ -:युग की उदासी।
*आज मुझसे बोल बादल।
*क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी।
* साथी सो ना कर कुछ बात।
*मधुकलश
*मधुशाला
*मधुबाला
साहित्यिक विशेषताये -: बच्चन जी की कविताओं में निराशावाद की झलक है.
उनकी लोकजीवन में प्रसिद्ध होने वाली कृति 'मधुशाला 'में इस युग और समाज की पीड़ा निहित है. इनकी भाषा में सरलता एवं सुबोधता है, जो आकर्षण की वस्तु है. फ़ारसी और उर्दू के प्रचलित शब्दों का प्रयोग मिलता है. बच्चन मुक्तकों के प्रणेता एवं गीतकार थे. इनके  पदों की माधुरी और लालित्य ईर्ष्या की वस्तु है. गीतों में गहराई के दर्शन होते है. कल्पना को  स्थान मिला है.
मृत्यु
अपनी उत्कृष्ट रचनाओं से लोगों के दिल में अमरत्व प्राप्त कर लेने वाले इस महान कवि नें 18 जनवरी, 2003 पर इस संसार को अलविदा कहा। उनकी मौत शरीर के महत्वपूर्ण अंग खराब हो जाने के कारण हुई थी। मृत्यु के वक्त उनकी आयु 95 वर्ष थी। जीवन का अंतिम सत्य मृत्यु ही होता है, पर कुछ लोग अपने सत्कर्म और सद्गुणों की ऐसी छाप छोड़ जाते हैं जिस कारण समाज उन्हे आने वाले लंबे समय तक याद करता है। स्वर्गीय रचनाकर हरिवंश राय बच्चन जी को हमारा शत-शत नमन.
            "क्या भूलों क्या याद करू "
हिन्दी साहित्य के देदीप्यमान आत्मकथाकार डॉ. हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा हिन्दी-साहित्य की एक कालजयी कृति है। उन्होंने अपने जीवन की तस्वीर को ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ‘, ‘नीड़ का निर्माण फिर‘, ‘बसेरे से दूर‘ एवं ‘दशद्वार से सोपान तक में‘ रूपान्तरित किया है। यह बहुप्रशंसित आत्मकथा एक महागाथा है जो उनके जीवन और साहित्य का वृत्तान्त ही नहीं कहती अपितु उत्तर छायावादी युग के साहित्यिक परिदृश्य को भी प्रस्तुत करती है।
बच्चन का काल के अनुरूप तथा विभिन्न परिस्थितियों में रहते हुए अपने आपको सहृदयों के समक्ष प्रस्तुत करना और विभिन्न मानसिकताओं के दौर से गुज़रते हुए आत्मविवरण को प्रस्तुत किया गया है। बच्चन की बाल्यावस्था का अबोधपन, युवामन का आकर्षण, प्रेमानुभूति, स्त्री-पुरुष सम्बन्धों, पारिवारिक सम्बन्धों तथा स्वानुभूतियों से सम्बन्धित अनेक प्रसंगों का अत्यन्त स्वाभाविक चित्रण बड़ी सहजता और तन्मयता के साथ किया गया है।
बच्चन द्वारा उम्र के विभिन्न पड़ावों में अलग-अलग रूपों मे सोचना जैसे - बालरूप, युवारूप और प्रौढ़ रूप एवं वृद्ध रूप इत्यादि उनकी आत्मकथा में मुखर हुआ है। उनकी आत्मकथा में पग-पग पर उनके मनोसंवेग विभिन्न रूपों में उभर कर आते हैं।
उनका सारा जीवन साधना एवं श्रम का जीवन रहा है। अपने बाहरी व्यक्तित्व के सन्दर्भ में वे स्वयं लिखते है "मैं कविता लिखता ही नहीं, मैं कवि दिखता भी हूँ।" जैसी मधुशाला थी वैसा ही मधुशाला का कवि रूप था।
उनका बाह्य एवं आंतरिक व्यक्तित्व पंत की इन पंक्तियों में मुखर हो उठा है –
"सिर पर बाल घने, घुंघराले, काले, कड़े बड़े, बिखरे से।
मस्ती, आजादी बेखबरी, बेफिक्री के है संदेसे।
माथा उठा हुआ ऊपर को भौहों में कुछ टेढ़ापन है।
दुनिया को है एक चुनौती, कभी नहीं झुकने का प्रण है।
आँखों में छाया प्रकाश की, आँख मिचौनी छिड़ी परस्पर।
बेचैनी में, बेखबरी में लुके-छिपे हैं सपने सुन्दर ।"

कालिदास


                ✴️कालिदास परिचय✴️
भारतवर्ष एक ऐसी पुण्य भूमि है जहाँ प्राचीन काल से अनेक महापुरुष, विचारक, वैज्ञानिक, तपस्वी, वीर, युद्धा, साहित्यकार, व लेखक अवतरित हुए है, जिन्होंने अपने जप -तप आदर्श चरित्र व संस्कार युक्त अभिव्यक्ति से मानव समाज का मार्गदर्शन किया है, ऐसे ही एक संस्कृत के प्रतिभावान महाकवि और श्रेष्ठ नाटककार थे "कालिदास "वे सम्राट विक्रमादित्य के नव रत्नों में से एक थे.
कालिदास के जन्म को लेकर कोई ठोस साबुत और जानकारी या कोई दस्तावेज़ नहीं हैं. अनेक विद्वानों का इनके जन्म को लेकर अलग – अलग मत हैं. कुछ विद्वान दुवारा 150 ईपु० से लेकर 400 ईo के बीच कालिदास के जन्म को माना जाता हैं. कुछ विद्वानों दुवारा तो गुप्त काल के समय को इनका जन्म माना जाता हैं. क्योकिं कालिदास के नाटक ‘मालविकाग्निमित्र’ में अग्निमित्र का वर्णन मिलता हैं. जो 170 ईपूo का शासक था. एक और कालिदास का उल्लेख वानभट्ट की ‘हर्षचरितम’ में मिलती हैं. जो छठी शताब्दी की रचना हैं. इसलिए इन सभी साक्ष्य को मानकर कालिदास के जन्म का समय पहली शताब्दी ईपुo से तीसरी शताब्दी के बीच माना जाता हैं.
कालिदास नाम का शाब्दिक अर्थ है, "काली का सेवक"। कालिदास शिव के भक्त थे। उन्होंने भारत की पौराणिक कथाओं और दर्शन को आधार बनाकर रचनाएं की। कलिदास अपनी अलंकार युक्त सुंदर सरल और मधुर भाषा के लिये विशेष रूप से जाने जाते हैं। उनके ऋतु वर्णन अद्वितीय हैं और उनकी उपमाएं बेमिसाल। संगीत उनके साहित्य का प्रमुख अंग है और रस का सृजन करने में उनकी कोई उपमा नहीं। उन्होंने अपने शृंगार रस प्रधान साहित्य में भी साहित्यिक सौन्दर्य के साथ साथ आदर्शवादी परंपरा और नैतिक मूल्यों का समुचित ध्यान रखा है। उनका नाम अमर है और उनका स्थान वाल्मीकि और व्यास की परम्परा में है।
❇️भारतीय संस्कृति व दर्शन की अभिव्यक्ति
कालिदास की प्रत्येक रचना भारतीय संस्कृति परम्परा का सजीव चित्रण मिलता है. उसकी रसभीनी सुगंध प्रत्येक पाठक व श्रोता को भावविभोर कर देती है, उनकी रचनाओं में प्रेम के लालित्य और उदात्त रूप सहज ही प्रकट हों जाते है उनके उदार एवं प्रेमपूर्ण व्यवहार का चित्रण स्प्ष्ट व ह्रदयस्पर्शी है उनका कथन अति सुंदर, लेखन उत्तम, अर्थपूर्ण व रोचक है. उनकी रचनाएँ बुद्धिमान, विचारकों एवं साधारण वाचकों सभी को समान आनंदित करती है.
                ❇️मुख्य रचनाएँ✴️
❇️नाटक-
अभिज्ञान शाकुन्तलम्, विक्रमोर्वशीयम् और मालविकाग्निमित्रम्;
❇️महाकाव्य- रघुवंशम् और कुमारसंभवम्, खण्डकाव्य- मेघदूतम् और ऋतुसंहार.
मालविकाग्निमित्रम् कालिदास की पहली रचना है, जिसमें राजा अग्निमित्र की कहानी है। अग्निमित्र एक निर्वासित नौकर की बेटी मालविका के चित्र के प्रेम करने लगता है। जब अग्निमित्र की पत्नी को इस बात का पता चलता है तो वह मालविका को जेल में डलवा देती है। मगर संयोग से मालविका राजकुमारी साबित होती है, और उसके प्रेम-संबंध को स्वीकार कर लिया जाता है।
अभिज्ञान शाकुन्तलम् कालिदास की दूसरी रचना है जो उनकी जगतप्रसिद्धि का कारण बना। इस नाटक का अनुवाद अंग्रेजी और जर्मन के अलावा दुनिया के अनेक भाषाओं में हुआ है। इसमें राजा दुष्यंत की कहानी है जो वन में एक परित्यक्त ऋषि पुत्री शकुन्तला (विश्वामित्र और मेनका की बेटी) से प्रेम करने लगता है। दोनों जंगल में गंधर्व विवाह कर लेते हैं। राजा दुष्यंत अपनी राजधानी लौट आते हैं। इसी बीच ऋषि दुर्वासा शकुंतला को शाप दे देते हैं कि जिसके वियोग में उसने ऋषि का अपमान किया वही उसे भूल जाएगा। काफी क्षमाप्रार्थना के बाद ऋषि ने शाप को थोड़ा नरम करते हुए कहा कि राजा की अंगूठी उन्हें दिखाते ही सब कुछ याद आ जाएगा। लेकिन राजधानी जाते हुए रास्ते में वह अंगूठी खो जाती है। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब शकुंतला को पता चला कि वह गर्भवती है। शकुंतला लाख गिड़गिड़ाई लेकिन राजा ने उसे पहचानने से इनकार कर दिया। जब एक मछुआरे ने वह अंगूठी दिखायी तो राजा को सब कुछ याद आया और राजा ने शकुंतला को अपना लिया। शकुंतला शृंगार रस से भरे सुंदर काव्यों का एक अनुपम नाटक है। कहा जाता है         
❇️काव्येषु नाटकं रम्यं तत्र रम्या शकुन्तला❇️
(कविता के अनेक रूपों में अगर सबसे सुन्दर नाटक है तो नाटकों में सबसे अनुपम शकुन्तला है।)
❇️✴️✴️कालिदास जी की रचनाएँ आप इन links से प्राप्त कर सकते है

रविवार, 12 जनवरी 2020

धडधडाती रेलों के पहियों तले
बिछ जाने की वजहें समाप्त नहीं होंगी मगर
मैंने ये समझने की कोशिश की
रेलें यात्रा के लिए हैं
चार हाथ की रस्सी चारा बाँधने के लिए है
दुर्भिक्ष तो सरोवर पर भी है
वह भी प्रतीक्षा करता है धीरे-धीरे सिमटने की

भूखों, निर्दोष कैदियों और स्त्रियों से
जीने की तालीम लेनी चाहिए
साँस की तरह चल रही हों
मरने की वजहें शरीर में, तो
पागलपन का आश्रय लेना चाहिए

पागलों में होती है यह बुद्धिमत्ता
खाना कपडा रहना न मिले
सारा जगत् ही उपेक्षा करे
तब भी जीवन तो है
उसे बचाया जाना चाहिए
जीवन को बचाने की योजना तो वह योजना है

आओ जरूरी दर्द
आओ जरूरी दर्द
मेरे सिर में रहो
इतनी रात गए
किसके पास जाओगे
आख़री हिचकी से पहले चारा-गर से पूछ लूँ
जो नज़र आता नहीं रिश्ता कहाँ ले जाएगा

कुछ तो है बात जो आती है क़ज़ा रुक रुक के
ज़िंदगी क़र्ज़ है क़िस्तों में अदा होती है 
जिस्म क्या है रूह तक सब कुछ ख़ुलासा देखिए

जिस्म क्या है रूह तक सब कुछ ख़ुलासा देखिए
आप भी इस भीड़ में घुस कर तमाशा देखिए

जो बदल सकती है इस पुलिया के मौसम का मिजाज़
उस युवा पीढ़ी के चेहरे की हताशा देखिए

जल रहा है देश यह बहला रही है क़ौम को
किस तरह अश्लील है कविता की भाषा देखिए

मतस्यगंधा फिर कोई होगी किसी ऋषि का शिकार
दूर तक फैला हुआ गहरा कुहासा देखिए

शनिवार, 27 जुलाई 2019

नवांकुर

जो शिला को भेदे बो अंकुर हो मैं.
अभी तो नवांकुर हो मैं.
नरम मुलायम मिट्टी की मुछे आस नही.
ये सुविधा सब के भाग्य मैं नहीं.
सह ली मैंने कड़कड़ाती बिजलियां.
देखे हैं मैंने काले तूफानी बादल.
इनका मुझको भय नहीं.
अमावस के अंधेरे से भी मुझे मतलब नहीं.
और पूर्णिमा के चाँद से मेरा कोई  नाता नहीं.
पछुआ के तुफानो मे भी मैं खड़ा रहा.
न गिरने की जिद पर अड़ा रहा.
कठोरता मुझपे हाबी नहीं.
और स्नेह की मुझे कोइ आस नहीं.
अभी तो नवांकुर हों मैं.
धूप मैं छाव मैं खड़ा मैं.
हर घाव मैं.
क्यों कि शीतलता मेरे स्भाव मे.
अपने को, पराये को सब को.
सभी को दूंगा मैं छाव.
मुझमे नहीं कोई दुर्भाव.
लेकिन इस छाव के.
बदले मिले मुझे.
हृदय पर पीड़ा के ढेरो घाव.
देख के तुम मेरी भलमनसयत.
धैर्य कि मेरे परिझा तुम लेना नहीं.
        वक्त के फेर ने बांधा है मुझे.
         बुरे समय मैं मैंने खुद को है साधा.
         नवीन सृजन का अंकुर हूं.
         अभी तो नवांकुर हूं मैं.