✴️कालिदास परिचय✴️
भारतवर्ष एक ऐसी पुण्य भूमि है जहाँ प्राचीन काल से अनेक महापुरुष, विचारक, वैज्ञानिक, तपस्वी, वीर, युद्धा, साहित्यकार, व लेखक अवतरित हुए है, जिन्होंने अपने जप -तप आदर्श चरित्र व संस्कार युक्त अभिव्यक्ति से मानव समाज का मार्गदर्शन किया है, ऐसे ही एक संस्कृत के प्रतिभावान महाकवि और श्रेष्ठ नाटककार थे "कालिदास "वे सम्राट विक्रमादित्य के नव रत्नों में से एक थे.
भारतवर्ष एक ऐसी पुण्य भूमि है जहाँ प्राचीन काल से अनेक महापुरुष, विचारक, वैज्ञानिक, तपस्वी, वीर, युद्धा, साहित्यकार, व लेखक अवतरित हुए है, जिन्होंने अपने जप -तप आदर्श चरित्र व संस्कार युक्त अभिव्यक्ति से मानव समाज का मार्गदर्शन किया है, ऐसे ही एक संस्कृत के प्रतिभावान महाकवि और श्रेष्ठ नाटककार थे "कालिदास "वे सम्राट विक्रमादित्य के नव रत्नों में से एक थे.
कालिदास के जन्म को लेकर कोई ठोस साबुत और जानकारी या कोई दस्तावेज़ नहीं हैं. अनेक विद्वानों का इनके जन्म को लेकर अलग – अलग मत हैं. कुछ विद्वान दुवारा 150 ईपु० से लेकर 400 ईo के बीच कालिदास के जन्म को माना जाता हैं. कुछ विद्वानों दुवारा तो गुप्त काल के समय को इनका जन्म माना जाता हैं. क्योकिं कालिदास के नाटक ‘मालविकाग्निमित्र’ में अग्निमित्र का वर्णन मिलता हैं. जो 170 ईपूo का शासक था. एक और कालिदास का उल्लेख वानभट्ट की ‘हर्षचरितम’ में मिलती हैं. जो छठी शताब्दी की रचना हैं. इसलिए इन सभी साक्ष्य को मानकर कालिदास के जन्म का समय पहली शताब्दी ईपुo से तीसरी शताब्दी के बीच माना जाता हैं.
कालिदास नाम का शाब्दिक अर्थ है, "काली का सेवक"। कालिदास शिव के भक्त थे। उन्होंने भारत की पौराणिक कथाओं और दर्शन को आधार बनाकर रचनाएं की। कलिदास अपनी अलंकार युक्त सुंदर सरल और मधुर भाषा के लिये विशेष रूप से जाने जाते हैं। उनके ऋतु वर्णन अद्वितीय हैं और उनकी उपमाएं बेमिसाल। संगीत उनके साहित्य का प्रमुख अंग है और रस का सृजन करने में उनकी कोई उपमा नहीं। उन्होंने अपने शृंगार रस प्रधान साहित्य में भी साहित्यिक सौन्दर्य के साथ साथ आदर्शवादी परंपरा और नैतिक मूल्यों का समुचित ध्यान रखा है। उनका नाम अमर है और उनका स्थान वाल्मीकि और व्यास की परम्परा में है।
कालिदास नाम का शाब्दिक अर्थ है, "काली का सेवक"। कालिदास शिव के भक्त थे। उन्होंने भारत की पौराणिक कथाओं और दर्शन को आधार बनाकर रचनाएं की। कलिदास अपनी अलंकार युक्त सुंदर सरल और मधुर भाषा के लिये विशेष रूप से जाने जाते हैं। उनके ऋतु वर्णन अद्वितीय हैं और उनकी उपमाएं बेमिसाल। संगीत उनके साहित्य का प्रमुख अंग है और रस का सृजन करने में उनकी कोई उपमा नहीं। उन्होंने अपने शृंगार रस प्रधान साहित्य में भी साहित्यिक सौन्दर्य के साथ साथ आदर्शवादी परंपरा और नैतिक मूल्यों का समुचित ध्यान रखा है। उनका नाम अमर है और उनका स्थान वाल्मीकि और व्यास की परम्परा में है।
❇️भारतीय संस्कृति व दर्शन की अभिव्यक्ति
कालिदास की प्रत्येक रचना भारतीय संस्कृति परम्परा का सजीव चित्रण मिलता है. उसकी रसभीनी सुगंध प्रत्येक पाठक व श्रोता को भावविभोर कर देती है, उनकी रचनाओं में प्रेम के लालित्य और उदात्त रूप सहज ही प्रकट हों जाते है उनके उदार एवं प्रेमपूर्ण व्यवहार का चित्रण स्प्ष्ट व ह्रदयस्पर्शी है उनका कथन अति सुंदर, लेखन उत्तम, अर्थपूर्ण व रोचक है. उनकी रचनाएँ बुद्धिमान, विचारकों एवं साधारण वाचकों सभी को समान आनंदित करती है.
❇️मुख्य रचनाएँ✴️
❇️नाटक-
अभिज्ञान शाकुन्तलम्, विक्रमोर्वशीयम् और मालविकाग्निमित्रम्;
❇️महाकाव्य- रघुवंशम् और कुमारसंभवम्, खण्डकाव्य- मेघदूतम् और ऋतुसंहार.
कालिदास की प्रत्येक रचना भारतीय संस्कृति परम्परा का सजीव चित्रण मिलता है. उसकी रसभीनी सुगंध प्रत्येक पाठक व श्रोता को भावविभोर कर देती है, उनकी रचनाओं में प्रेम के लालित्य और उदात्त रूप सहज ही प्रकट हों जाते है उनके उदार एवं प्रेमपूर्ण व्यवहार का चित्रण स्प्ष्ट व ह्रदयस्पर्शी है उनका कथन अति सुंदर, लेखन उत्तम, अर्थपूर्ण व रोचक है. उनकी रचनाएँ बुद्धिमान, विचारकों एवं साधारण वाचकों सभी को समान आनंदित करती है.
❇️मुख्य रचनाएँ✴️
❇️नाटक-
अभिज्ञान शाकुन्तलम्, विक्रमोर्वशीयम् और मालविकाग्निमित्रम्;
❇️महाकाव्य- रघुवंशम् और कुमारसंभवम्, खण्डकाव्य- मेघदूतम् और ऋतुसंहार.
मालविकाग्निमित्रम् कालिदास की पहली रचना है, जिसमें राजा अग्निमित्र की कहानी है। अग्निमित्र एक निर्वासित नौकर की बेटी मालविका के चित्र के प्रेम करने लगता है। जब अग्निमित्र की पत्नी को इस बात का पता चलता है तो वह मालविका को जेल में डलवा देती है। मगर संयोग से मालविका राजकुमारी साबित होती है, और उसके प्रेम-संबंध को स्वीकार कर लिया जाता है।
अभिज्ञान शाकुन्तलम् कालिदास की दूसरी रचना है जो उनकी जगतप्रसिद्धि का कारण बना। इस नाटक का अनुवाद अंग्रेजी और जर्मन के अलावा दुनिया के अनेक भाषाओं में हुआ है। इसमें राजा दुष्यंत की कहानी है जो वन में एक परित्यक्त ऋषि पुत्री शकुन्तला (विश्वामित्र और मेनका की बेटी) से प्रेम करने लगता है। दोनों जंगल में गंधर्व विवाह कर लेते हैं। राजा दुष्यंत अपनी राजधानी लौट आते हैं। इसी बीच ऋषि दुर्वासा शकुंतला को शाप दे देते हैं कि जिसके वियोग में उसने ऋषि का अपमान किया वही उसे भूल जाएगा। काफी क्षमाप्रार्थना के बाद ऋषि ने शाप को थोड़ा नरम करते हुए कहा कि राजा की अंगूठी उन्हें दिखाते ही सब कुछ याद आ जाएगा। लेकिन राजधानी जाते हुए रास्ते में वह अंगूठी खो जाती है। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब शकुंतला को पता चला कि वह गर्भवती है। शकुंतला लाख गिड़गिड़ाई लेकिन राजा ने उसे पहचानने से इनकार कर दिया। जब एक मछुआरे ने वह अंगूठी दिखायी तो राजा को सब कुछ याद आया और राजा ने शकुंतला को अपना लिया। शकुंतला शृंगार रस से भरे सुंदर काव्यों का एक अनुपम नाटक है। कहा जाता है
❇️काव्येषु नाटकं रम्यं तत्र रम्या शकुन्तला❇️
❇️काव्येषु नाटकं रम्यं तत्र रम्या शकुन्तला❇️
(कविता के अनेक रूपों में अगर सबसे सुन्दर नाटक है तो नाटकों में सबसे अनुपम शकुन्तला है।)
❇️✴️✴️कालिदास जी की रचनाएँ आप इन links से प्राप्त कर सकते है
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➡️Abhigyan Shakuntalam
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