हरीवंश राय बच्चन
बच्चन जी हिंदी के ऐसे कवि हैं जिन्होंने खुद कविता नहीं लिखी है बल्कि कविता ने ही स्वयं जिन्हे लिखा है. वह ज्ञान के बल पर किताबें पढ़ कर या काव्य सिद्धांत सीखकर नहीं लिखी गईं है, वह उनके जीवन से फुटकर आई है. ये शब्द है कवि गोपाल दास नीरज के हरिवंश राय बच्चन जी के काव्य के बारे में.
हिंदी साहित्य के आकाश में अर्धशती से अधिक समय तक देदीप्यमान नझत्र की भांति चमकने वाले कवि हरीवंश राय बच्चन का जन्म 27 नवंबर, 1907 को उत्तरप्रदेश के प्रागराज (इलाहबाद ) के एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था.इनका नाम हरिवंश राय था पर माँ दुलार से इन्हे बच्चन कहती थी, इनके पिता का नाम बाबू प्रतापनारायण था. इनकी प्राम्भिक शिझा एक स्थानीय पाठशाला में हुईं थी.
1938 में इन्होने इलाहबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम ए उत्तीर्ण किया . असहयोग आंदोलन के दिनों में आपने अध्ययन स्थगित कर दिया. इसके बाद एक एक करके बच्चन जी, 'चाँद', 'भविष्य', 'अभ्युदय ', प्रयाग महिला विधापीठ '
पायनियर प्रेस, इलाहबाद मिडिल स्कूल आदि में काम किया.
पत्नी के देहावसान पर उनका ह्रदय शौक मग्न हों उठा. कवि नैराश्य के सागर में डूबा और 'मधुकलश 'का प्रणयन कर बच्चन जी ने उन्हें समर्पित किया.
इसके उपरांत बच्चन जी प्रयाग विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के अध्यापक रहे. लंदन से पी. एच. डी. की उपाधि प्राप्त की इसके बाद बच्चन जी ने विदेश मंत्रालय में प्रतिष्ठित रहकर हिंदी की गौरव वृद्धि में योगदान दिया.
1966 में हरिवंशराय बच्चन का भारतीय राज्य सभा के लिए नामनिर्देशित हुआ और इसके तीन साल बाद ही सरकार ने उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया। 1976 में, उनके हिंदी भाषा के विकास में अभूतपूर्व योगदान के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया गया.और उनके सफल जीवनकथा, क्या भूलू क्या याद रखु, नीदा का निर्मन फिर, बसेरे से दूर और दशद्वार से सोपान तक के लिए सरस्वती सम्मान दिया गया। इसी के साथ उन्हें नेहरू पुरस्कार लोटस पुरस्कार भी मिले है। अगर हम उन के बारे में प्रस्तावना जान्ने की कोशिश करे तो वन उन्होंने बहोत आसान बताई है। मिटटी का तन, मस्ती का मन, क्षण भर जीवन- यही उनका परिचय है।
रचनाएँ -:युग की उदासी।
*आज मुझसे बोल बादल।
*क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी।
* साथी सो ना कर कुछ बात।
*मधुकलश
*मधुशाला
*मधुबाला
साहित्यिक विशेषताये -: बच्चन जी की कविताओं में निराशावाद की झलक है.
उनकी लोकजीवन में प्रसिद्ध होने वाली कृति 'मधुशाला 'में इस युग और समाज की पीड़ा निहित है. इनकी भाषा में सरलता एवं सुबोधता है, जो आकर्षण की वस्तु है. फ़ारसी और उर्दू के प्रचलित शब्दों का प्रयोग मिलता है. बच्चन मुक्तकों के प्रणेता एवं गीतकार थे. इनके पदों की माधुरी और लालित्य ईर्ष्या की वस्तु है. गीतों में गहराई के दर्शन होते है. कल्पना को स्थान मिला है.
मृत्यु
अपनी उत्कृष्ट रचनाओं से लोगों के दिल में अमरत्व प्राप्त कर लेने वाले इस महान कवि नें 18 जनवरी, 2003 पर इस संसार को अलविदा कहा। उनकी मौत शरीर के महत्वपूर्ण अंग खराब हो जाने के कारण हुई थी। मृत्यु के वक्त उनकी आयु 95 वर्ष थी। जीवन का अंतिम सत्य मृत्यु ही होता है, पर कुछ लोग अपने सत्कर्म और सद्गुणों की ऐसी छाप छोड़ जाते हैं जिस कारण समाज उन्हे आने वाले लंबे समय तक याद करता है। स्वर्गीय रचनाकर हरिवंश राय बच्चन जी को हमारा शत-शत नमन.
"क्या भूलों क्या याद करू "
हिन्दी साहित्य के देदीप्यमान आत्मकथाकार डॉ. हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा हिन्दी-साहित्य की एक कालजयी कृति है। उन्होंने अपने जीवन की तस्वीर को ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ‘, ‘नीड़ का निर्माण फिर‘, ‘बसेरे से दूर‘ एवं ‘दशद्वार से सोपान तक में‘ रूपान्तरित किया है। यह बहुप्रशंसित आत्मकथा एक महागाथा है जो उनके जीवन और साहित्य का वृत्तान्त ही नहीं कहती अपितु उत्तर छायावादी युग के साहित्यिक परिदृश्य को भी प्रस्तुत करती है।
बच्चन का काल के अनुरूप तथा विभिन्न परिस्थितियों में रहते हुए अपने आपको सहृदयों के समक्ष प्रस्तुत करना और विभिन्न मानसिकताओं के दौर से गुज़रते हुए आत्मविवरण को प्रस्तुत किया गया है। बच्चन की बाल्यावस्था का अबोधपन, युवामन का आकर्षण, प्रेमानुभूति, स्त्री-पुरुष सम्बन्धों, पारिवारिक सम्बन्धों तथा स्वानुभूतियों से सम्बन्धित अनेक प्रसंगों का अत्यन्त स्वाभाविक चित्रण बड़ी सहजता और तन्मयता के साथ किया गया है।
बच्चन द्वारा उम्र के विभिन्न पड़ावों में अलग-अलग रूपों मे सोचना जैसे - बालरूप, युवारूप और प्रौढ़ रूप एवं वृद्ध रूप इत्यादि उनकी आत्मकथा में मुखर हुआ है। उनकी आत्मकथा में पग-पग पर उनके मनोसंवेग विभिन्न रूपों में उभर कर आते हैं।
उनका सारा जीवन साधना एवं श्रम का जीवन रहा है। अपने बाहरी व्यक्तित्व के सन्दर्भ में वे स्वयं लिखते है "मैं कविता लिखता ही नहीं, मैं कवि दिखता भी हूँ।" जैसी मधुशाला थी वैसा ही मधुशाला का कवि रूप था।
उनका बाह्य एवं आंतरिक व्यक्तित्व पंत की इन पंक्तियों में मुखर हो उठा है –
"सिर पर बाल घने, घुंघराले, काले, कड़े बड़े, बिखरे से।
मस्ती, आजादी बेखबरी, बेफिक्री के है संदेसे।
माथा उठा हुआ ऊपर को भौहों में कुछ टेढ़ापन है।
दुनिया को है एक चुनौती, कभी नहीं झुकने का प्रण है।
आँखों में छाया प्रकाश की, आँख मिचौनी छिड़ी परस्पर।
बेचैनी में, बेखबरी में लुके-छिपे हैं सपने सुन्दर ।"
बच्चन जी हिंदी के ऐसे कवि हैं जिन्होंने खुद कविता नहीं लिखी है बल्कि कविता ने ही स्वयं जिन्हे लिखा है. वह ज्ञान के बल पर किताबें पढ़ कर या काव्य सिद्धांत सीखकर नहीं लिखी गईं है, वह उनके जीवन से फुटकर आई है. ये शब्द है कवि गोपाल दास नीरज के हरिवंश राय बच्चन जी के काव्य के बारे में.
हिंदी साहित्य के आकाश में अर्धशती से अधिक समय तक देदीप्यमान नझत्र की भांति चमकने वाले कवि हरीवंश राय बच्चन का जन्म 27 नवंबर, 1907 को उत्तरप्रदेश के प्रागराज (इलाहबाद ) के एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था.इनका नाम हरिवंश राय था पर माँ दुलार से इन्हे बच्चन कहती थी, इनके पिता का नाम बाबू प्रतापनारायण था. इनकी प्राम्भिक शिझा एक स्थानीय पाठशाला में हुईं थी.
1938 में इन्होने इलाहबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम ए उत्तीर्ण किया . असहयोग आंदोलन के दिनों में आपने अध्ययन स्थगित कर दिया. इसके बाद एक एक करके बच्चन जी, 'चाँद', 'भविष्य', 'अभ्युदय ', प्रयाग महिला विधापीठ '
पायनियर प्रेस, इलाहबाद मिडिल स्कूल आदि में काम किया.
पत्नी के देहावसान पर उनका ह्रदय शौक मग्न हों उठा. कवि नैराश्य के सागर में डूबा और 'मधुकलश 'का प्रणयन कर बच्चन जी ने उन्हें समर्पित किया.
इसके उपरांत बच्चन जी प्रयाग विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के अध्यापक रहे. लंदन से पी. एच. डी. की उपाधि प्राप्त की इसके बाद बच्चन जी ने विदेश मंत्रालय में प्रतिष्ठित रहकर हिंदी की गौरव वृद्धि में योगदान दिया.
1966 में हरिवंशराय बच्चन का भारतीय राज्य सभा के लिए नामनिर्देशित हुआ और इसके तीन साल बाद ही सरकार ने उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया। 1976 में, उनके हिंदी भाषा के विकास में अभूतपूर्व योगदान के लिए पद्म भूषण से सम्मानित किया गया.और उनके सफल जीवनकथा, क्या भूलू क्या याद रखु, नीदा का निर्मन फिर, बसेरे से दूर और दशद्वार से सोपान तक के लिए सरस्वती सम्मान दिया गया। इसी के साथ उन्हें नेहरू पुरस्कार लोटस पुरस्कार भी मिले है। अगर हम उन के बारे में प्रस्तावना जान्ने की कोशिश करे तो वन उन्होंने बहोत आसान बताई है। मिटटी का तन, मस्ती का मन, क्षण भर जीवन- यही उनका परिचय है।
रचनाएँ -:युग की उदासी।
*आज मुझसे बोल बादल।
*क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी।
* साथी सो ना कर कुछ बात।
*मधुकलश
*मधुशाला
*मधुबाला
साहित्यिक विशेषताये -: बच्चन जी की कविताओं में निराशावाद की झलक है.
उनकी लोकजीवन में प्रसिद्ध होने वाली कृति 'मधुशाला 'में इस युग और समाज की पीड़ा निहित है. इनकी भाषा में सरलता एवं सुबोधता है, जो आकर्षण की वस्तु है. फ़ारसी और उर्दू के प्रचलित शब्दों का प्रयोग मिलता है. बच्चन मुक्तकों के प्रणेता एवं गीतकार थे. इनके पदों की माधुरी और लालित्य ईर्ष्या की वस्तु है. गीतों में गहराई के दर्शन होते है. कल्पना को स्थान मिला है.
मृत्यु
अपनी उत्कृष्ट रचनाओं से लोगों के दिल में अमरत्व प्राप्त कर लेने वाले इस महान कवि नें 18 जनवरी, 2003 पर इस संसार को अलविदा कहा। उनकी मौत शरीर के महत्वपूर्ण अंग खराब हो जाने के कारण हुई थी। मृत्यु के वक्त उनकी आयु 95 वर्ष थी। जीवन का अंतिम सत्य मृत्यु ही होता है, पर कुछ लोग अपने सत्कर्म और सद्गुणों की ऐसी छाप छोड़ जाते हैं जिस कारण समाज उन्हे आने वाले लंबे समय तक याद करता है। स्वर्गीय रचनाकर हरिवंश राय बच्चन जी को हमारा शत-शत नमन.
"क्या भूलों क्या याद करू "
हिन्दी साहित्य के देदीप्यमान आत्मकथाकार डॉ. हरिवंशराय बच्चन की आत्मकथा हिन्दी-साहित्य की एक कालजयी कृति है। उन्होंने अपने जीवन की तस्वीर को ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ‘, ‘नीड़ का निर्माण फिर‘, ‘बसेरे से दूर‘ एवं ‘दशद्वार से सोपान तक में‘ रूपान्तरित किया है। यह बहुप्रशंसित आत्मकथा एक महागाथा है जो उनके जीवन और साहित्य का वृत्तान्त ही नहीं कहती अपितु उत्तर छायावादी युग के साहित्यिक परिदृश्य को भी प्रस्तुत करती है।
बच्चन का काल के अनुरूप तथा विभिन्न परिस्थितियों में रहते हुए अपने आपको सहृदयों के समक्ष प्रस्तुत करना और विभिन्न मानसिकताओं के दौर से गुज़रते हुए आत्मविवरण को प्रस्तुत किया गया है। बच्चन की बाल्यावस्था का अबोधपन, युवामन का आकर्षण, प्रेमानुभूति, स्त्री-पुरुष सम्बन्धों, पारिवारिक सम्बन्धों तथा स्वानुभूतियों से सम्बन्धित अनेक प्रसंगों का अत्यन्त स्वाभाविक चित्रण बड़ी सहजता और तन्मयता के साथ किया गया है।
बच्चन द्वारा उम्र के विभिन्न पड़ावों में अलग-अलग रूपों मे सोचना जैसे - बालरूप, युवारूप और प्रौढ़ रूप एवं वृद्ध रूप इत्यादि उनकी आत्मकथा में मुखर हुआ है। उनकी आत्मकथा में पग-पग पर उनके मनोसंवेग विभिन्न रूपों में उभर कर आते हैं।
उनका सारा जीवन साधना एवं श्रम का जीवन रहा है। अपने बाहरी व्यक्तित्व के सन्दर्भ में वे स्वयं लिखते है "मैं कविता लिखता ही नहीं, मैं कवि दिखता भी हूँ।" जैसी मधुशाला थी वैसा ही मधुशाला का कवि रूप था।
उनका बाह्य एवं आंतरिक व्यक्तित्व पंत की इन पंक्तियों में मुखर हो उठा है –
"सिर पर बाल घने, घुंघराले, काले, कड़े बड़े, बिखरे से।
मस्ती, आजादी बेखबरी, बेफिक्री के है संदेसे।
माथा उठा हुआ ऊपर को भौहों में कुछ टेढ़ापन है।
दुनिया को है एक चुनौती, कभी नहीं झुकने का प्रण है।
आँखों में छाया प्रकाश की, आँख मिचौनी छिड़ी परस्पर।
बेचैनी में, बेखबरी में लुके-छिपे हैं सपने सुन्दर ।"
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