रविवार, 12 जनवरी 2020

धडधडाती रेलों के पहियों तले
बिछ जाने की वजहें समाप्त नहीं होंगी मगर
मैंने ये समझने की कोशिश की
रेलें यात्रा के लिए हैं
चार हाथ की रस्सी चारा बाँधने के लिए है
दुर्भिक्ष तो सरोवर पर भी है
वह भी प्रतीक्षा करता है धीरे-धीरे सिमटने की

भूखों, निर्दोष कैदियों और स्त्रियों से
जीने की तालीम लेनी चाहिए
साँस की तरह चल रही हों
मरने की वजहें शरीर में, तो
पागलपन का आश्रय लेना चाहिए

पागलों में होती है यह बुद्धिमत्ता
खाना कपडा रहना न मिले
सारा जगत् ही उपेक्षा करे
तब भी जीवन तो है
उसे बचाया जाना चाहिए
जीवन को बचाने की योजना तो वह योजना है

आओ जरूरी दर्द
आओ जरूरी दर्द
मेरे सिर में रहो
इतनी रात गए
किसके पास जाओगे
आख़री हिचकी से पहले चारा-गर से पूछ लूँ
जो नज़र आता नहीं रिश्ता कहाँ ले जाएगा

कुछ तो है बात जो आती है क़ज़ा रुक रुक के
ज़िंदगी क़र्ज़ है क़िस्तों में अदा होती है 
जिस्म क्या है रूह तक सब कुछ ख़ुलासा देखिए

जिस्म क्या है रूह तक सब कुछ ख़ुलासा देखिए
आप भी इस भीड़ में घुस कर तमाशा देखिए

जो बदल सकती है इस पुलिया के मौसम का मिजाज़
उस युवा पीढ़ी के चेहरे की हताशा देखिए

जल रहा है देश यह बहला रही है क़ौम को
किस तरह अश्लील है कविता की भाषा देखिए

मतस्यगंधा फिर कोई होगी किसी ऋषि का शिकार
दूर तक फैला हुआ गहरा कुहासा देखिए